तमिलनाडु और केरल विधानसभाओं में राज्यपालों द्वारा अभिभाषण न पढ़ने की घटनाओं ने राज्य सरकारों और राजभवनों के बीच बढ़ते टकराव को उजागर किया है। संविधान के अनुसार, राज्यपाल को मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृत भाषण पढ़ना होता है, न कि अपनी निजी राय व्यक्त करनी होती है। यह स्थिति संघीय व्यवस्था में संतुलन की आवश्यकता पर बल देती है।
भारतीय संविधान में राज्यपाल का पद गरिमा, संतुलन और परंपरा का प्रतीक माना गया है। उसका काम है संविधान के अनुसार चलना और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना। पर, तमिलनाडु और केरल विधानसभा में जो हुआ, वह राज्य सरकार और राजभवनों के बीच चल रहे टकरावों की ताजा कड़ी है।
तथ्यों पर सवाल। केरल में पिनराई सरकार का आरोप है कि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कैबिनेट से स्वीकृत अभिभाषण नहीं पढ़ा। कहा जा रहा है कि उन्होंने वे हिस्से छोड़ दिए, जिनमें बताया गया था कि केंद्र की नीतियों की वजह से केरल को किस तरह वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा है। वहीं, तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने विधानसभा के सालाना सत्र की शुरुआत से पहले यह कहते हुए परंपरागत उद्घाटन भाषण नहीं पढ़ा कि उसमें तथ्य सही नहीं हैं और राष्ट्रगान का सम्मान नहीं किया गया।
दखल सही नहीं । संविधान और परंपरा – दोनों ही यह कहते हैं कि राज्यपाल को वही भाषण पढ़ना होता है, जिसे राज्य मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी हो। यह भाषण राज्यपाल का निजी विचार नहीं, चुनी हुई सरकार की नीतियों का आधिकारिक दस्तावेज होता है। संविधान के मुताबिक, राज्यपाल कैबिनेट की सलाह पर काम करते हैं। वह अपनी निजी राय या असहमति को अभिभाषण के जरिये व्यक्त नहीं कर सकते।