राइट टू डिसकनेक्ट बिल के मुताबिक, कर्मचारी तय ऑफिस टाइम के बाद काम से जुड़े कॉल, मैसेज या ई-मेल का जवाब न देने के अधिकारी होंगे. अगर उनपर उनके बॉस द्वारा इसका दबाव बनाया जाता है, तो कंपनी या सोसायटी पर उसके टोटल रेन्यूमरेशन का 1% तक जुर्माना लगाया जाएगा.
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बदली लाइफस्टाइल की वजह से डिप्रेशन के मामले ज्यादा बढ़ने लगे हैं. इसका एक कारण लॉन्ग वर्क आवर्स भी है. जरा सोचिए. आपने ईमानदारी से ऑफिस में अपने 9 घंटे पूरे किए. जितना असाइमेंट दिया गया था, उसे पूरा किया. आपके पास कोई पेंडिंग नहीं है. आप अपना काम खत्म कर ऑफिस से घर के लिए निकलते हैं. लेकिन, घर पहुंचते ही या डिनर करते वक्त या आधी नींद में आपको ऑफिस से बॉस या मैनेजर का कॉल आ जाता है. बॉस आपको किसी काम के लिए फटकार लगाते हैं या फिर कोई नया असाइनमेंट दे देते हैं.
ऐसे में नौकरी बचाने के चक्कर में आप न तो बॉस की कॉल काट पाते हैं और न मैसेज को अनरीड छोड़ पाते हैं. थक हारकर या मन मारकर आपको फिर से काम करना पड़ता है. आप सोचते हैं इसके सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है. असल में ऐसा नहीं है. बहुत जल्द आपको बॉस की कॉल डिसकनेक्ट करने का राइट मिल सकता है.
कब पास हुआ बिल?
दरअसल, लोकसभा में 5 दिसंबर को एक प्राइवेट मेंबर बिल (PMB) पेश किया गया है. इसका नाम ‘राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025 (Right to Disconnect Bill 2025)’ है. इसका उद्देश्य कर्मचारियों को ऑफिस टाइम के बाहर काम से जुड़े फोन कॉल और ईमेल का जवाब देने से छूट देना है.
किसने पेश किया ये बिल?
‘राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025’ एक प्राइवेट बिल है. इसे कोई मंत्री पेश नहीं करता. इसे कोई सांसद ही पेश करता है. इस बिल को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में पेश किया.2018 में भी सांसद सुप्रिया सुले ने ये बिल लाने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर चर्चा आगे नहीं बढ़ पाई थी.
राइट टू डिसकनेक्ट बिल की खास बातें
- इस बिल का मकसद एम्प्लॉइज को वर्क और पर्सनल लाइफ के बीच बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है.
- ये बिल एम्प्लॉयीज को शिफ्ट आवर्स के बाद काम न करने की आजादी देता है.
- ऑफिस से निकलने के बाद कॉल, ईमेल-मैसेज या वॉट्सऐप को आप इग्नोर कर सकते हैं.
- इमरजेंसी या अर्जेंसी में अगर कॉल किया जाए, तो आपको रिस्पॉन्सिव होना होगा.
कानून तोड़ने वालों के खिलाफ लीगल एक्शन का प्रावधान
- अगर ये बिल पास होकर कानून बन जाता है. अगर कोई इस कानून को तोड़ता है, तो उसके खिलाफ लीगल एक्शन लिए जाने का प्रावधान है.
- ऐसे मामले में एम्प्लॉयी अपने मैनेजर या बॉस के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है. इस शिकायत पर जांच होगी. जांच के बाद आरोप सही पाए गए, तो लीगल एक्शन लिया जाएगा.
- अगर उनपर उनके बॉस द्वारा इसका दबाव बनाया जाता है, तो संस्था (कंपनी या सोसायटी) पर उसके टोटल रेन्यूमरेशन का 1% तक जुर्माना लगाया जाएगा.
क्या है आगे का प्रोसेस?
अभी लोकसभा में इस बिल पर चर्चा होगी. फिर इसके पास होने के बाद इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा.दोनों सदनों से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया जाएगा. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मुहर लगने पर ये कानून बन जाएगा. बता दें कि साल 1970 के बाद से कोई भी PMB दोनों सदनों में पारित नहीं हुआ है.
वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर कब छिड़ी थी बहस?
पिछले साल महाराष्ट्र के पुणे में 26 साल की एना सेबेस्टियन पेरिइल की काम की कार्डियक अरेस्ट से मौत हो गई थी. एना चार्टर्ड अकाउंटेंट थीं. उन्होंने फरवरी 2024 में एक कंपनी में नौकरी शुरू की थी और 6 महीने के अंदर उनकी मौत हो गई. एना की मां अनीता ऑगस्टीन ने आरोप लगाए थे कि एक्सट्रीम वर्क प्रेशर के चलते उनकी बेटी की जान गई. इस घटना के बाद ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ की मांग जोर पकड़ने लगी थी.
लॉन्ग वर्क आवर्स में भारत 12वें नंबर पर
दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहां एम्प्लॉयीज लॉन्ग वर्किंग आवर्स से परेशान हैं. इस लिस्ट में भारत 12वें नंबर पर आता है. सबसे ज्यादा वर्किंग आवर्स भूटान में है, जहां एम्प्लॉयीज एक हफ्ते में 54.4 घंटे काम करते हैं. दूसरे नंबर पर यूनाइटेड अरब अमीरात आता है. यहां कर्मचारियों को हफ्ते में 50.9 घंटे काम करना पड़ता है. तीसरे नंबर पर लेसोथो है, जहां 50.4 घंटे वर्क आवर्स है. चौथे नंबर पर कांगो (48.46 घंटे), पांचवें नंबर पर कतर (48 घंटे), छठे नंबर पर लाइबेरिया (47.7 घंटे), सातवें नंबर पर मॉरिटानिया (47.6 घंटे), आठवें नंबर पर मंगोलिया (47.3 घंटे), नौवें नंबर पर जॉर्डन (47 घंटे), दसवें नंबर पर बांग्लादेश (46.9 घंटे), ग्यारवें नंबर पर पाकिस्तान (46.9 घंटे), बारहवें नंबर पर भारत (46.7 घंटे) है. इसके बाद चीन का नंबर आता है. यहां एक हफ्ते में 46.1 घंटे का वर्क आवर्स है.
इन देशों में लागू है राइट टू डिसकनेक्ट बिल
अभी ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, आयरलैंड, जर्मनी, इटली, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, चिली, मेक्सिको, यूक्रेन, लग्जमबर्ग और अर्जेंटीना में राइट टू डिसकनेक्ट एक्ट लागू है.